आकांक्षा रहित क्रिया अभ्यास - श्री भूपेन्द्रनाथ सान्याल महाशय

21

Feb
By Praveen Bhatiya
47

आकांक्षा रहित क्रिया अभ्यास - श्री भूपेन्द्रनाथ सान्याल महाशय

क्रिया करनी ही होगी, और वह भी फल की इच्छा छोड़कर करनी होगी। फल की इच्छा करने की आदत हम लोगों में बहुत गहरी है। देह का अभिमान और विषयों में अधिक आसक्ति के कारण ऐसा होता है। क्रिया करते समय भी हममें से बहुत लोग फल की कामना करते रहते हैं।
शरीर स्वस्थ रहेगा, अधिक आयु मिलेगी, या क्रिया करते समय कोई अद्भुत दर्शन या श्रवण होगा - ऐसी अनेक इच्छाएँ क्रियावानों के मन में उठती हैं। इस विषय में थोड़ा विचार करना चाहिए। शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध के लोभ में न जाने कितने जन्म बीत गए। क्या अब भी हम इन विषयों की माया का जाल नहीं काट सकेंगे?
जब इतने जन्म विषयों में ही बीत गए, तो क्या इस बार क्रिया और साधना पाकर भी हम जन्म-मरण के दुःख से मुक्त होने का प्रयास नहीं करेंगे? क्या इस बार भी मोह के कुएँ में पड़े रहकर विषय रूपी मल ही ग्रहण करते रहेंगे? क्या श्येन पक्षी की तरह सूखे मांस के लोभ में हम इस अमूल्य जीवन को व्यर्थ जाने देंगे?


कबीर ने कहा है -
"सहकामी सुमिरन करे, पावे ऊँचा धाम।
निहकामी सुमिरन करे, पावे अविचल राम।।"


अर्थात सकाम भाव से भजन करने वाला उच्च लोकों को प्राप्त करता है, पर निष्काम भाव से भजन करने वाला जन्म-मरण से परे, स्थिर और सुंदर परमात्मा में लीन होकर संसार के दुःख को पार कर जाता है।
निष्काम भाव से साधना करने पर थोड़े ही प्रयास में क्रिया की परावस्था प्राप्त होती है। जब क्रिया की परावस्था उत्तम हो जाती है, तभी परम पुरुष में प्रवेश मिलता है। यही परावस्था परम पद है। मनुष्य जीवन पाकर हर व्यक्ति के लिए आवश्यक है कि इस परम पद की प्राप्ति के लिए पूरा प्रयास करे।
"गुरु, कृष्ण, साधु तीनों की दया हुई, पर अपनी दया के बिना जीव नष्ट हो गया।"


अर्थ यह है कि गुरु, कृष्ण और साधु की कृपा तो मिल सकती है, पर यदि मनुष्य स्वयं पर दया न करे, तो उसका पतन हो जाता है। इसलिए हर व्यक्ति को अपने ऊपर दया करके क्रिया का अभ्यास करना चाहिए।
~ श्रीमद्भगवद्गीता, श्रीमद् भूपेन्द्रनाथ सान्याल महाशय की आध्यात्मिक व्याख्या, अध्याय 3, श्लोक 19 🙏🙏