भक्ति की शक्ति या प्रेडिक्टिव प्रोग्रामिंग का छिपा हुआ एजेंडा?

09

Jun
By Virat anand
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भक्ति की शक्ति या प्रेडिक्टिव प्रोग्रामिंग का छिपा हुआ एजेंडा?

 

जिसके सामने आप झुक गए, वहाँ भक्ति का जन्म हुआ या फिर प्रारब्ध सक्रिय हो गया। झुकना वास्तव में अहंकार के टूटने का एक बहुत बड़ा अनुभव हो सकता है। लेकिन आज वही भक्ति और समर्पण कई जगहों पर एक प्रकार के मनोवैज्ञानिक जाल और मैनिपुलेशन का हिस्सा बन गए हैं।

यदि आप अधिकांश भक्ति-प्रधान संस्थाओं में जाएंगे, तो आपको बार-बार यही सिखाया जाएगा कि जहाँ भक्ति है, जहाँ एकत्व (Oneness) है, वहाँ भी एक पदानुक्रम (Hierarchy) मौजूद है—प्रभुजी, स्वामीजी, वरिष्ठ प्रभुजी, बड़े सिंहासन वाले स्वामीजी। यह किसी पिरामिड स्कीम जैसा प्रतीत होता है, जहाँ आध्यात्मिकता भी स्तरों और पदों में बाँट दी जाती है।

जब कृत्रिम खाद्य संकट, ईंधन संकट या अन्य सामाजिक परिस्थितियाँ उत्पन्न की जाती हैं, तब देशभक्ति और सामूहिक भावनाओं की प्रेडिक्टिव प्रोग्रामिंग भी शुरू हो जाती है। कुछ पीआर इवेंट्स में बड़े स्वामीजी झाड़ू लगाते हुए, जमीन पर बैठकर भोजन करते हुए, सार्वजनिक मंच पर रोते हुए, या किसी प्रसिद्ध व्यक्ति का अहंकार तोड़ते हुए दिखाई देंगे। ऐसे दृश्य इस प्रकार प्रस्तुत किए जाते हैं कि लगे उनमें अहंकार का नामोनिशान नहीं है।

धीरे-धीरे आपको ऐसा मानसिक "चूर्ण" दिया जाता है कि आपकी व्यक्तिगत भक्ति बहुत छोटी और अधूरी प्रतीत होने लगे। फिर भगवान को दिखाने, सिद्ध करने या विशेष भक्तों की श्रेणी में आने की चाह में लोग बड़े-बड़े त्याग, प्रदर्शन और भक्ति के प्रमाण देने लगते हैं।

यहीं पर व्यक्ति अपने ही प्रक्षेपण (Projection) में एक असहाय, निर्भर और कायर मानसिकता का निर्माण कर लेता है। वह अपनी आंतरिक शक्ति को किसी बाहरी सत्ता को सौंप देता है। फिर उसी अनुभव और विचारधारा को "लीड बाय एग्ज़ाम्पल" के नाम पर दूसरों को सिखाता है। यही अनुभव नए भक्तों के लिए ब्लूप्रिंट बन जाता है।

परिणामस्वरूप, यह मैट्रिक्स व्यक्ति को एक ऐसे उद्धारकर्ता (Saviour) की प्रतीक्षा में रखता है, जो हर युग में किसी अवतार, बाबा, राजनीतिक नेता या आध्यात्मिक गुरु के रूप में सामने आ जाता है। फिर वही व्यक्ति या संस्था धार्मिक व्यवस्थाओं के भीतर अपना कथानक स्थापित करती है और जनसमर्थन तथा शक्ति अर्जित करती है।

आप भक्ति और "भक्त" की पहचान में इतने उलझ जाते हैं कि आपका विवेक, चेतना और बुद्धि धीरे-धीरे नियंत्रण में आ जाते हैं। कुछ आध्यात्मिक अनुभवों, कुछ सिद्धियों या विशेष अनुभूतियों के बदले व्यक्ति अपनी जीवन-ऊर्जा उसी व्यवस्था का साधन बना देता है।

लेकिन वास्तविक भक्ति कहाँ से प्रारम्भ होती है?

वास्तविक भक्ति तब प्रारम्भ होती है जब व्यक्ति स्वयं से मिलना शुरू करता है। जब उसे अनुभव होता है कि उसका सच्चा गुरु उसके भीतर ही है। तब अलगाव (Separation) से एकत्व (Oneness) की यात्रा शुरू होती है। वहीं स्वयं के प्रति प्रेम, समर्पण और बिना शर्त प्रेम (Unconditional Love) का अनुभव जन्म लेता है।

उससे पहले तक व्यक्ति केवल "भक्त" की पहचान को जी रहा होता है। वह गुड मैन सिंड्रोम, झूठे समर्पण और आध्यात्मिक पात्रों की कहानियों में अपनी भूमिका निभा रहा होता है।

यही इस पूरे विषय का सबसे बड़ा विरोधाभास (Paradox) है—जब तक अलगाव का अनुभव है, तब तक वास्तविक भक्ति प्रारम्भ ही नहीं हो सकती। और जब एकत्व का अनुभव हो जाता है, तब भक्ति अपने सबसे शुद्ध स्वरूप में प्रकट होती है।