मनुष्य एक इमोशनल बीइंग है। मनुष्य में इमोशंस मुख्य हैं और सभी इमोशंस में सबसे पुरानी इमोशन है डर। जब से हम परमात्मा से बिछड़े हैं, तब से हमें एक अनजान सा डर है - क्या होगा? कैसे होगा? जब से हम परमात्मा से बिछड़े हैं, तब से यह डर हमारे साथ है।
बच्चा जब पैदा होता है, जैसे ही वह मां से जुड़ा होता है, उस कॉर्ड को काटते हैं, तब बच्चे को उसके जीवन की पहली आहट मिलती है और डर से मुलाकात होती है। बच्चा मां के पेट में उस कॉर्ड द्वारा सब कुछ पा रहा था, उसका पालन-पोषण हो रहा था। वह कॉर्ड कटते ही उसे यह डर सताने लगता है कि वह कैसे सर्वाइव करेगा। इस तरह जीवन में आते ही बच्चों को सबसे पहले डर का अनुभव होता है।
तो यह हमारी सबसे पुरानी या सबसे पहली इमोशन है, जो हम सब में मौजूद है।
दूसरी बात, अज्ञान की वजह से डर लगता है। जब जानते नहीं हैं, तो डर लगता है। हम बच्चों को कहते हैं कि उस कमरे में भूत है, तो वह डर जाता है। क्यों? क्योंकि अज्ञान है। वह लाइट कर देगा तो जान जाएगा कि यहां तो कुछ भी नहीं है। रस्सी में सांप दिख जाता है - यह अज्ञान है। प्रकाश होते ही रस्सी दिखाई देती है। ज्ञान हो गया, डर चला गया।
सुनसान जगह पर खड़े होते हैं तो डर लगता है, कोई और इंसान आ जाए तो डर चला जाता है। तो इस इमोशन पर धीरे-धीरे काम करके इसे ज्ञान द्वारा मिटाना होगा। जैसे-जैसे हम ज्ञान को उपलब्ध होते जाएंगे, वैसे-वैसे डर से मुक्त होते जाएंगे।
हम सब जानते हैं कि डर हमें आगे नहीं बढ़ने देता। आत्मा की यात्रा में सबसे बड़ी रुकावट डर है। और एक नहीं, कई प्रकार के डर हैं, जो हमारी चेतना के स्तर को 100 पर (निम्न स्तर पर) लाकर रख देते हैं। हम सब जानते हैं कि हमारी परवरिश ही दंड और पुरस्कार के नियम पर की गई है। हर बार कहा जाता है - ऐसा नहीं करोगे तो यह दंड मिलेगा। उस डर की वजह से हम वही करने लगते हैं जो कहा जाता है।
ऐसे ही हमारे पूरे जीवन की एक-एक बात डर पर ही टिकी है और इस डर की वजह से हम स्वतंत्र तरीके से नहीं जी पाते। हमारे पूरे जीवन पर डर का ही साम्राज्य छाया है। तो यहां हमने जाना कि मूलतः हमारा रोग क्या है।
डायग्नोसिस हो जाए तो आधा काम तो हो ही गया। हमने इस बात से आज जाना कि डर हकीकत में हमारे जीवन में कैसे छाया हुआ है।