ध्यान के उस पल में,
जहाँ स्रोत से जुड़ाव होता है,
कोई दृश्य नहीं उभरता,
कोई स्वर नहीं गूंजता।
फिर भी…
आँखें बरस पड़ती हैं।
ना पता चलता है
साँस चल रही है या थमी हुई है।
ना दुनिया का होश रहता है,
ना अपने होने का।
बस भीतर
कुछ हिलता है 🪷🪷
जैसे बरसों से रुकी
कोई परत पिघल रही हो।
सिसकियाँ हैं
जिनका कोई नाम नहीं।
आँसू हैं
जिनका कोई कारण नहीं।
यह रोना
दुख का नहीं है।
यह रोना
थकान का भी नहीं है।
यह आँसू
उस घर की याद के हैं 🏡✨
जहाँ से हम कभी गए ही नहीं थे।
अपने ही उच्चतम स्वरूप की
एक झलक के हैं 🌟🦋
कुछ पल के लिए ही सही,
याद आ जाता है -
मैं कभी अलग था ही नहीं। ☺️✨🕊
यही है घर वापसी।
जहाँ कोई शब्द नहीं,
कोई पहचान नहीं,
कोई खोज नहीं।
सिर्फ
होना है।
और वही
सब कुछ है।