जब आप नकारात्मक विचारों, परिस्थितियों, लोगों या यादों का विरोध करना बंद कर देते हैं, तब आप उन्हें तटस्थ भाव से देखने लगते हैं। हो सकता है कि ये विचार या भाव आपको फिर से अपने जाल में फँसाने की पूरी कोशिश करें। ऐसे समय में अभ्यास, धैर्य और साहस की ज़रूरत होती है।
जब आपको यह समझ आ जाती है कि यह सब मैट्रिक्स का खेल है, तब आप विचारों, भावनाओं और लोगों को बिना उलझे, तटस्थ भाव से देख पाते हैं। यह आसान नहीं है, लेकिन लगातार अभ्यास और अपने विवेक से यह संभव हो जाता है।
जब आप किसी भी स्थिति को तटस्थ भाव से देखते हैं, तब न आप उसका विरोध करते हैं और न ही उसे सही ठहराने की कोशिश करते हैं। इसे ही “no resistance, no justification” कहा जाता है। इसी अवस्था को साक्षी भाव भी कहा जाता है। इस स्थिति में आप मैट्रिक्स की चालों को अपनी ऊर्जा देना बंद कर देते हैं, और तब विचार, भावनाएँ और यादें आप पर हावी नहीं होतीं।
यहाँ तक हमारी सारी आध्यात्मिक साधनाएँ काम करती रही हैं। यही हमने अपने अनुभव से जाना है।
इसी बिंदु से इज़ुमी जी और प्रवीण जी की शिक्षाएँ शुरू होती हैं। वे सिखाते हैं कि वर्तमान क्षण में, डबल स्लिट और डिलेयड चॉइस प्रयोगों की समझ के साथ, साक्षी भाव में रहकर सृजन कैसे शुरू किया जाता है।
उस समय आप स्वयं को एक क्रिएटर के रूप में अनुभव करते हैं और फिर अपनी चेतना के स्तर से सचेत सृजन करते हैं।
ये शिक्षाएँ पुराने मैट्रिक्स को तोड़ने और एक नई वास्तविकता बनाने की मूल नींव बताती हैं।
TGA की शिक्षाएँ यहीं से शुरू होती हैं, और यह गंभीर साधकों के लिए तेज़ी से काम करती हैं।