पहले हम यह जानते हैं कि हमारा शरीर रोगग्रस्त क्यों होता है। हम एक बात पर गौर करेंगे कि जब हम जीवन में अत्यंत स्ट्रेस से गुजरते हैं या ट्रॉमा जैसी स्थिति आती है, तब हमारा दिमाग ठीक से काम करना बंद कर देता है। वह आगे सोच ही नहीं पाता। तब क्या होता है? पूरी बॉडी का बैलेंस बिगड़ जाता है।
हमारे शरीर में 32 वाइटल ग्लैंड्स हैं, जैसे किडनी, पेनक्रियास, लिवर, थायरॉयड आदि। अब क्या होता है जब हमारा दिमाग तीन दिन से ज्यादा इस ट्रॉमा में रहता है? उस समय जो दिमाग पर स्ट्रेस होता है, वह किसी एक ग्लैंड को इंबैलेंस कर देता है और वहीं स्ट्रेस रिलीज हो जाता है। अगर स्ट्रेस ने पेनक्रियास को प्रभावित किया तो शुगर आ जाएगी, हृदय को डैमेज किया तो हार्ट स्ट्रोक आ जाएगा।
अब यह क्यों हुआ? क्योंकि अचानक आई ट्रॉमा जैसी स्थिति में हम अपने आपको संभाल नहीं पाए और कोई वाइटल ऑर्गन डैमेज हो गया, जिससे रोग उत्पन्न हो गया। इसे सायकोसोमेटिक इफेक्ट कहते हैं। 90% रोग इसी तरह आते हैं, बाकी 10% शरीर की गलत जीवनशैली के कारण होते हैं।
तो सोचिए, जो रोग हमारी वजह से पैदा हुए, क्या उन्हें हम स्वयं मिटा नहीं सकते? हम अगर रोग पैदा कर सकते हैं तो उन्हें मिटा भी सकते हैं। यदि हम अपनी प्राण ऊर्जा को उस ग्लैंड तक पहुंचाएँ और वह ग्लैंड अपनी मूल फ्रिक्वेंसी पर वाइब्रेट करने लगे, तो हम बिना दवाई अपने आप हील हो सकते हैं। हर ग्लैंड एक निश्चित फ्रिक्वेंसी पर वाइब्रेट करता है। जब उसकी फ्रिक्वेंसी स्लो हो जाती है, तो वह सही तरह से काम नहीं कर पाता। ऐसे में अपनी प्राण ऊर्जा बढ़ाकर उस ग्लैंड तक ऊर्जा भेजकर हम स्वयं को हील कर सकते हैं।
हम यदि बीमार हो सकते हैं, तो हिल भी हो सकते हैं। अपने इस पावर को पहचानना, उसका उपयोग करना और स्वयं को हील करने की आदत डालना जरूरी है।